Sunday, June 21, 2015

बारिश !!

This is a transliteration of a poem originally written by a good friend of mine. All credits of the thoughts should go to my friend !!

बरस्ना था इस बारिश को न जाने कब तक
बादल बनके फैला था मन की आसमान में अब तक  । 
ऐसे पिघला है अश्कोंके धार न जाने किस की प्यार में 
जैसे काली घटा गरज के पिघला हो सावन के मौसम में  ॥